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दस महा विद्या बागलमुखी ।।पीताम्बरा ।।
शनि ग्रह की अधिष्ठात्री देवी ब्राह्मण के द्वारा पूजित और गुरु गम्य शक्ति ब्रह्मविद्या सिद्धि प्राप्ति देवी भोग एवं मोक्ष हेतु उपासना साधना हेतु मार्गदर्शन पुराणों से विवरण संक्षिप्त परिचय।।

पितांबरा बगलामुखी स्थिरामुखी को वैष्णवविद्या सिद्ध करने के प्रयास बहुत ही सिद्ध हुए परंतु इससे यह विद्या संक्रमित हो गयी अथर्ववेद के बगलासूक्त में अनेक प्रकार की कृत्याओं का वर्णन किया गया है यजुर्वेद की काण्व शाखा में तथा तैत्तिरीय काठक एवं मैत्रायणी शाखा में भी इन कृत्याओं का उल्लेख प्राप्त होता है।

उक्त ऋचा मे वैष्णवी शब्द का भी प्रयोग किया गया है उसका अर्थ विष्णुपासिता शक्ति ग्रहण सिद्ध करना था यह स्तंभन शक्तिस्वरूपा है यजुर्वेद (३२/६) मैं कहा गया है- येन घौरूग्रा पृथिवी च दृढा येन स्व:स्तम्भितं नाकः । यो अन्तरिक्षे रजसो विमान: कस्मै देवाय हविषा विधेम। यहां भी इस संबंध कार्य का उल्लेख मिलता है किंतु यहां देवी को पुरुष रूप में प्रस्तुत किया गया है और यजुर्वेद (३२/७)में भी यही प्रसंग मिलता है।जबकि यह सत्य है कि वेदों में शिव और शक्ति है ही नहीं परंतु लोगों ने वेदों में निश्चित करने की बहुत ही कोशिश की है वेदों की ऋचाओं को शिव शक्ति संप्रदाय जोड़ने का प्रयास किया गया है जैसे वलगन का अर्थ है शत्रुविनाशार्थ भूमि में निक्षिप्त कृत्याविशेष और वलगहा का अर्थ है- ऐसी कृत्याओं की हन्त्री शक्ति तैत्तिरीय ब्राह्मण यह भी कहा गया है कि देवताओं का वध करने हेतु असुरों ने अभिचार प्रयोग किया यह अभिचार ही वलग है असुरा ‌वै‌ नियन्तो देवानां‌ प्राणेषु वलगान न्यखनन। यानी देवताओं की देवी को राक्षस लोग देवताओं के विरुद्ध उपयोग कर रहे है।अगर इन बातों को देखा जाए तो स्वामी दयानंद ने वेदों का सही उल्लेख करके आर्य समाज की स्थापना की आर्य समाजी न शिव को मानते हैं न शक्ति को न विष्णु को ने मूर्ति को ने मूर्ति पूजा को भगवती का आविर्भाव काल उत्पत्ति का कारक है विष्णु की तपस्या और दिन है मंगलवार तिथि है चतुर्दशी समय अर्धरात्री जन्म पूर्व की स्थिति सुंदरी की जल क्रीड़ा है।
भगवती पितांबरा की भैरव एकवक्त्र महारुद्र है शिव और उनकी शक्तियां शक्ति पूजा में दस शक्तियां ही प्रमुख है यह दस महाविद्या कहलाती हैं महाकाली तारा षोडशी भुनेश्वरी छिन्नमस्ता भैरवी बगलामुखी मातंगी कमला एवं धूमावती यह क्रमश महाकाल अक्षोभ्य पंचमुख शिव त्र्यम्बक शिव कबन्ध शिव दक्षिणामूर्ति कालभैरव एकमुख महारुद्र मतंगशिव एवं सदाशिव पुरुष की शक्तियां है धूमावती के कोई पुरूष नहीं है क्योंकि ये विधवा है।

दसमहाविधा को वैदिक विद्या सिद्ध करने में भरपूर कोशिश की गई है चलो उन्हें वैदिक विद्या मान भी लें तो भी आने वाली पीढ़ी उनके प्रभाव से वंचित हो जाएंगी यह किसी ने भी नहीं सोचा क्योंकि किसी विद्या को संक्रमित करने से उसका प्रभाव क्षीण हो जाता है।

सर्वशत्रु बाधा व भुत प्रेत विनाशक बगला प्रत्यंगिरा कवच
ॐ अस्यश्री बगला प्रत्यंगिरा मंत्रस्य नारद ऋषि स्त्रिष्टुप छन्द प्रत्यंगिरा देवता ह्ल्रीं बीज हुं शक्तिः ह्रीं कीलकं ह्लीं ह्लीं ह्लीं ह्लीं प्रत्यंगिरा मम् शत्रुविनाश जपेविनियोगः
मंन्त्र–ॐ प्रत्यंगिरायै नमः प्रत्यंगिरे सकल कामान् साध्य मम् रक्षां कुरू कुरू सर्वान शत्रु ने खादय खादय् मारय मारय घातक घातयॐ ह्रीं फट् स्वाहा ॐभ्रामरी स्तम्भिनी देवी क्षोभिणी मोहनी तथा संहारिणी द्राविणी च जृम्भणी रौद्ररूपिणी इत्यष्टौ शक्तयो देवि शत्रुपक्षे नियोजताः धारयेत् कण्ठदेशे च सर्व शत्रु विनाशनी
ॐह्रींभ्रामरी सर्व शत्रुन भ्रामक भ्रामक ॐ ह्री स्वाहा
ॐ ह्रीं स्तम्भिनी मम् शत्रुन स्तम्भय सतम्भय ॐह्रीस्वाहा
ॐ ह्रीं क्षोभिणी मम शत्रु क्षोभय क्षोभय ॐह्रीं स्वाहा
ॐ ह्रीं मोहिनी मम् शत्रुघन मोहय मोहयॐह्रीं स्वाहा
ॐ ह्रीं सहांरिणी मम शत्रुघन संहारय संहारय ॐ ह्रीं स्वाहा
ॐ ह्रीं द्रावणी मम शत्रुघन द्रावय द्रावय ॐ ह्रीं स्वाहा
ॐ ह्रीं जृम्भिणी मम शत्रुन जृम्भय जृम्भय ॐ ह्रीं स्वाहा
ॐ ह्रीं रौद्रि मम शत्रुघन सन्तापय सन्तापय ॐ ह्रीं स्वाहा

मां बगलामुखी धाम यज्ञशाला दक्षिणेश्वरी काली पीठ प्राचीन वन खंडेश्वर महादेव शिव मंदिर कैलाश प्रकाश स्टेडियम चौराहा साकेत मेरठ के आचार्य प्रदीप गोस्वामी, राज पुरोहित, पीतांबरा पीठाधीश्वर का लेखन …